Un में जब आतंकवाद के तीखे सवालों से बच निकले शहबाज शरीफ

Un में जब आतंकवाद के तीखे सवालों से बच निकले शहबाज शरीफ

जब न्यूयॉर्क में दुनिया भर के बड़े नेता संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच पर शांति और वैश्विक सुरक्षा की लंबी-चौड़ी बातें करते हैं, तो अक्सर कैमरे के पीछे का सच कुछ और ही कहानी बयां कर रहा होता है। इस बार यूएन मुख्यालय के बाहर कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को तीखे और सीधे सवालों का सामना करना पड़ा। पत्रकारों ने बिना किसी लाग-लपेट के उनसे पूछ लिया कि आखिर पाकिस्तान आतंकवादियों को पनाह देना कब बंद करेगा।

इस वाकये ने एक बार फिर उस पुराने और गंभीर सवाल को हवा दे दी है जिस पर दुनिया आंखें मूंदकर बैठ जाती है। हाफिज सईद जैसे ग्लोबल आतंकवादियों पर कार्रवाई को लेकर जब सवाल दागे गए, तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने चुप्पी साधना ही बेहतर समझा। वे बिना एक भी जवाब दिए वहां से चुपचाप निकल गए। लेकिन क्या सवालों से भागने से हकीकत बदल जाती है? बिल्कुल नहीं।

जब मंच पर कुछ और और बाहर कुछ और होता है

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ बड़े-बड़े भाषण देना और घर के पिछले दरवाजे से आतंकियों को खाद-पानी देना पाकिस्तान की पुरानी फितरत रही है। जब भी यूएनजीए का सत्र आता है, इस्लामाबाद की तरफ से आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारी नुकसान उठाने के रटे-रटाए दावे दोहराए जाते हैं। लेकिन जब पत्रकारों द्वारा लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद या जैश प्रमुख मसूद अजहर जैसे चेहरों पर ठोस कार्रवाई का ब्योरा मांगा जाता है, तो पूरी की पूरी व्यवस्था पानी मांगती नजर आती है।

यथार्थ यह है कि कागजी रेड बुक्स और दिखावे के इनामों से आतंकवाद खत्म नहीं होता। जब तक स्टेट पॉलिसी के तौर पर इन तत्वों का इस्तेमाल बंद नहीं होगा, तब तक किसी भी मंच पर दी गई सफाई का कोई मतलब नहीं रह जाता।

घर के अंदर सुलगती आग और आर्थिक तंगी

शहबाज शरीफ के सामने सिर्फ अंतरराष्ट्रीय दबाव ही नहीं है, बल्कि घरेलू मोर्चे पर भी हालात हाथ से निकलते जा रहे हैं। पाकिस्तान के भीतर राजनीतिक अस्थिरता चरम पर है। एक तरफ पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी के तेवर तीखे हैं और विरोध प्रदर्शनों का दौर जारी है, तो दूसरी तरफ देश की अर्थव्यवस्था आईसीयू में पड़ी है। वित्त मंत्री खुद मान चुके हैं कि आए दिन होने वाली हड़तालों और राजनीतिक हंगामे से देश को रोजाना अरबों रुपयों का फटका लग रहा है।

जब देश की जनता दो वक्त की रोटी और महंगाई से जूझ रही हो, तब सरकार का ध्यान अपनी नाकामियों को छुपाने और वैश्विक मंच पर झूठी छवि गढ़ने में लगा रहता है। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी अब इन खोखले दावों को और अधिक बर्दाश्त करने के मूड में नहीं दिखती।

अब देखना यह दिलचस्प होगा कि इन तीखे सवालों और बदहाल अर्थव्यवस्था के साये में प्रधानमंत्री शरीफ अपने भाषण में क्या नई दलीलें पेश करते हैं। सच्चाई यह है कि दुनिया अब जान चुकी है कि मंच पर दिया गया हर भाषण हकीकत से कोसों दूर होता है।

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LM

Lily Morris

With a passion for uncovering the truth, Lily Morris has spent years reporting on complex issues across business, technology, and global affairs.