यमन में छिड़ी जंग ने एक बार फिर से लाखों बेकसूर नागरिकों को भुखमरी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड फूड प्रोग्राम यानी WFP की चेतावनी के मुताबिक करीब 8 लाख लोगों तक जरूरी खाद्य सहायता पहुंच पाना असंभव सा हो गया है। दशकों से राजनीतिक अस्थिरता और संघर्ष की मार झेल रहे इस देश में युद्ध के मैदान लगातार बदल रहे हैं, जिससे मानवीय सहायता पहुंचाने वाले राहत कर्मियों के रास्ते बंद हो गए हैं।
सवाल यह है कि इस मची तबाही के बीच असली कीमत किसे चुकानी पड़ रही है। जवाब साफ है, आम यमनी नागरिक, खासकर महिलाएं और बच्चे, जो युद्ध के मोर्चों के बीच फंसे हुए हैं।
ताइज़ शहर में सबसे भयावह स्थिति
यमन का तीसरा सबसे बड़ा शहर और ताइज़ प्रांत की राजधानी ताइज़ इस वक्त मानवीय त्रासदी का केंद्र बना हुआ है। अकेले इसी इलाके में 6 लाख से ज्यादा लोग फूड सहायता से महरूम हो चुके हैं। इनमें से लगभग 2 लाख सिर्फ महिलाएं और छोटे बच्चे हैं। शहर के चारों ओर चल रही सैन्य गतिविधियां, लगातार होते हवाई और जमीनी हमले, और रास्तों पर बैठे सशस्त्र समूहों की नाकाबंदी ने राहत सामग्री के ट्रकों को पूरी तरह रोक दिया है।
स्थानीय जानकारों के मुताबिक, जब तक मुख्य सड़कों को सुरक्षित नहीं किया जाता, तब तक राहत शिविरों और ग्रामीण बस्तियों तक एक दाना अनाज पहुंचाना भी नामुमकिन रहेगा। पश्चिमी तट के इलाकों में भी हाल के दिनों में सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है।
बाज़ारों में खाली होती अलमारियां और भुखमरी का साया
यह संकट ऐसे समय में गहराया है जब यमन के स्थानीय बाजारों में खाने-पीने की चीजों का स्टॉक पहले ही তল छू चुका है। आटे जैसी बुनियादी जरूरत की चीजें या तो मिल नहीं रही हैं या उनकी कीमतें आम आदमी की पहुंच से कोसों दूर हो चुकी हैं।
वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के ताजा आंकड़ों पर नजर डालें तो पूरे यमन में 1.8 करोड़ से ज्यादा लोगों के पास दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के भी पैसे या साधन नहीं हैं। जिन इलाकों में राहत पहुंच भी रही है, वहां भी करीब 74% परिवार अपनी रोजाना की कैलोरी और पोषण की जरूरतें पूरी करने में नाकाम साबित हो रहे हैं। युद्ध की वजह से अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है, जिससे लोगों की क्रय शक्ति शून्य हो गई है।
कौन लड़ रहा है और किसे मिल रही है सजा
यमन का यह संघर्ष किसी एक मोर्चे पर सीमित नहीं है। एक तरफ यमन की सरकारी सेना और उसके सहयोगी गठबंधन देश हैं, तो दूसरी तरफ हूती विद्रोही हैं जो देश के बड़े भू-भाग पर काबिज हैं। सऊदी अरब और हूतियों के बीच लगातार हो रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों ने इस भौगोलिक क्षेत्र को एक बारूद के ढेर में बदल दिया है। हूती विद्रोही सरकारी नियंत्रण वाले क्षेत्रों को निशाना बना रहे हैं, जबकि दूसरी ओर से जवाबी कार्रवाई जारी है। इस त्रिकोणीय संघर्ष में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के प्रयास अक्सर कागजी साबित होते हैं और जमीन पर केवल बारूद की गंध और भुखमरी ही बचती है।
जब तक इस संघर्ष को थामने के लिए कोई ठोस कूटनीतिक पहल नहीं होती, तब तक 8 लाख या उससे अधिक लोगों का यह संकट और विकराल रूप लेता जाएगा। राहत एजेंसियों के पास संसाधन सीमित हैं और सुरक्षा के खतरे अनंत हैं। आने वाले दिनों में यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने तत्काल युद्धविराम और मानवीय गलियारों को खोलने का दबाव नहीं बनाया, तो यमन की यह स्थिति आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में दर्ज हो जाएगी।